Tuesday, November 15, 2011

क्या स्वामी विवेकानंद जी गौमांस खाया करते थे ? Swami Vivekanand's Food

भाई अमित शर्मा जी ने एक पत्रिका से उदृधृत करते हुए यह पोस्ट पेश की थी। इस पोस्ट पर भाई प्रतुल वशिष्ठ जी ने एक ऐसा कमेंट किया जिसने हमें चौंका दिया।
प्रतुल वशिष्ठ जी ने कहा कि स्वामी विवेकानंद जी गौमांस खाकर बीमार पड़ गए थे और इसी बीमारी में वह मर गए।
हमारे लिए यह जानकारी अचंभित करने वाली थी कि एक हिंदू सन्यासी मांस खाए और वह भी पवित्र गौ का ?
इसीलिए इस पोस्ट को हम यहां पेश कर रहे हैं ताकि जो लोग यह बात नहीं जानते, वे भी इस बात को जान लें कि सच्चाई क्या है ?

वह पोस्ट निम्न है-

सोमवार, १५ नवम्बर २०१०

यज्ञ हो तो हिंसा कैसे ।। वेद विशेष ।। भाग -- २

इस संसार में अनेक प्रकार की प्रकृति के लोग है ; गीताजी में उनको दो भागों में विभक्त किया गया है ------ एक दैवी प्रकृति के तथा दूसरे आसुरी प्रकृति के मनुष्य----
     "द्वौ भूतसर्गौ लोकेsस्मिन दैव आसुर एव च"

इन दोनों प्रकार की प्रकृति के मनुष्यों के बारे में कुछ बताने की आवश्यकता ही नहीं है. फिर भी बिलकुल सूक्ष्म रूप से कहना चाहे तो कह सकते है की दैवी प्रकृति के लोग सात्विक जीवनचर्या का निर्वहन करते हुए परोपकार में निरत रहते है, जबकि आसुरी वृत्ति के मनुष्य दंभ,मान और मद में उन्मत्त हुए स्वेच्छाचार पूर्ण आचरण करते हुए पापमय जीवन जीते है.
बतलाने की आवश्यकता नहीं की प्राय ऐसे आसुरी लोग ही मांस-भक्षण और अश्लील सेवन की रूचि रखते है, और ऐसे कुक्करों ने ही अर्थ का अनर्थ करके वेद आदि शास्त्रों में मद्य मांस तथा मैथुन की आज्ञा सिद्ध करने की धृष्टता की है.


महाभारत में कहा गया है की प्राचीन काल से यज्ञ-याग आदि केवल अन्न से ही होते आये है. मद्य-मांस की प्रथा इन धूर्त असुरों ने अपनी मर्जी से चला दी है. वेद में इन वस्तुओं का विधान ही नहीं है------
१.  श्रूयते हि पुरा कल्पे  नृणां  विहिमयः  पशु: । 
    येनायजन्त  यज्वानः  पुण्यलोकपरायणाः ।।                  
२. सुरां मत्स्यान मधु मांसमासवं क्रसरौदनम । 
    धुर्ते:  प्रवर्तितं  ह्योतन्नैतद  वेदेषु कल्पितम ।।


असुर शब्द का अर्थ ही है --- "प्राण का पोषण करने वाला"  जो अपने सुख के लिए दूसरे प्राणियों की हिंसा करते है वे सभी असुर है. ये शास्त्र पड़ते हि इसलिए है की शास्त्र का मनमाना अर्थ करके येनकेन प्रकारेण शब्दों की व्युत्पत्ति करके खींचतान से चाहे जो अर्थ निकाल कर शास्त्रों की मर्यादा का नाश किया जा सके. इन कुकर्मियों द्वारा वेदों द्वारा यज्ञों में मद्य-मांस का विधान, पशुवध की रीति बतायी गयी है ऐसा कहा जाता है .


वेद साक्षात भगवान् की वाणी है, उनमें ऐसी कोई बात कभी नहीं हो सकती जो मनुष्य को अनर्गल विषयभोग और हिंसा की और जाने के लिए प्रोत्साहित करती हो. वेद भगवान् की तो स्पष्ट आज्ञा है ------------ "मा हिंस्यात सर्वा भूतानि" ( किसी भी प्राणी की हिंसा ना करें ).
बल्कि यज्ञ के ही जो प्राचीन नाम है उनसे ही यह सिद्ध हो जाता है की यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक होते आये है.
"ध्वर" शब्द का अर्थ है हिंसा. जहाँ ध्वर अर्थात हिंसा ना हो उसी का नाम है "अध्वर" . यह "अध्वर" ही यज्ञ का पर्यायवाची नाम है . अतः हिंसात्मक कृत्य कभी भी वेद विहित यज्ञ नहीं माना जा सकता है.
"यज" धातु से "यज्ञ" बनता है. इसका अर्थ है----- देवपूजा,संगतिकरण और दान. इनमें से कोई से भी क्रिया हिंसा का संकेत नहीं करती है.


वैदिक यज्ञों में तो मांस का इतना विरोध है की मांस जलाने वाली आग को सर्वथा ताज्य घोषित किया गया है. प्राय: चिताग्नि ही मांस जलाने वाली होती है. जहाँ अपनी मृत्यु से मरे हुए मनुष्यों के अंत्येष्टि-संस्कार में उपयोग की जाने वाली अग्नि का भी बहिष्कार है, वहाँ पावन वेदी पर प्रतिष्ठापित विशुद्ध अग्नि में अपने द्वारा मरे गए पशु के होम का विधान कैसे हो सकता है ?
आज भी जब वेदी पर अग्नि की स्थापना होती तो उसमें से अग्नि का थोडा सा अंश निकालकर बाहर रख दिया जाता है. इस भावना के साथ की कहीं उसमें क्रव्याद (मांस-भक्षी या मांस जलाने वाली अग्नि ) के परमाणु ना मिले हो. अत: "क्रव्यादांशं त्यक्त्वा" (क्रव्याद का अंश निकालकर ही ) होम करने की विधि है.
ऋग्वेद का वचन है-------
     क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः ।
       एहैवायमितरो जातवेदा  देवेभ्यो  हव्यं  वहतु  प्रजानन ।। 
                                                                                   ( ऋ ७।६।२१।९ )
"मैं  मांस भक्षी या जलाने वाली अग्नि को दूर हटाता हूँ, यह पाप का भार ढोने वाली है ; अतः यमराज के घर में जाए. इससे भिन्न जो यह दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव है, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ. ये इस हविष्य को देवताओं के समीप पहुँचायें ; क्योंकि ये सब देवताओं को जानने वाले है."


ऋग्वेद में तो यहाँ तक कहाँ गया है की जो राक्षस मनुष्य,घोड़े और गाय आदि पशुओं का मांस खाता हो तथा गाय के दूध को चुरा लेता हो, उसका मस्तक काट डालो --------
यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्गक्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः ।
  यो  अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां  शीर्षाणि  हरसापि वृश्च ।। 
( ऋ ८।४।८।१६ )
 
अब प्रश्न होता है की वेदों में आदि मांस वाचक या हिंशा बोधक कोई शब्द ही प्रयुक्त न हुआ होता तो कोई उसका इस तरह का अर्थ कैसे निकाल सकता है ? 
इसका चिंतन करने योग्य सरल उत्तर यह है की प्रकृति स्वभावतः निम्न गामी होती है ; अतः प्रकृति के वश में रहने वाले मनुष्यों की प्रवृत्ति स्वभावतः विषयभोग की ओर जाती है. आसुरी स्वाभाव वाले विशेष रूप से निकृष्ट भोगों की तरफ जातें है. ओर उनकी प्राप्ति के साधन खोजतें है. इसी न्याय से इन आसुरी प्रकृति के लोगों ने वेद कथनों का मनमाना अर्थ लगा कर अपने कुकर्मों को वेद विहित कर्म घोषित कर दिया. 
महाभारत में प्रसंग आता है की एक बार ऋषियों और दूसरे लोगों में  "अज" शब्द के अर्थ पे विवाद हुआ. ऋषि पक्ष का कहना था की "अजेन यष्टव्यम" का अर्थ है  "अन्न से यज्ञ करना चाहिये. अज का अर्थ है उत्पत्ति रहित; अन्न का बीज ही अनादी परम्परा से चला आ रहा है; अतः वही  "अज" का मुख्य अर्थ है; इसकी उत्पत्ति का समय किसी को ज्ञात नहीं है; अतः वही अज है."
दूसरा पक्ष अज का अर्थ बकरा करता था. दोनों पक्ष निर्णय कराने के लिए राजा वसु के पास गए. वसु कई यज्ञ कर चुका था . उसके किसी भी यज्ञ में  मांस का प्रयोग नहीं हुआ था, पर उस समय तक वह मलेच्छों के संपर्क में आकर ऋषि द्वेषी बन गया था. ऋषि उसकी बदली मनोवृत्ति से अनजान उसी के पास न्याय करवाने पहुँच गए . उसने दोनों का पक्ष सुनकर ऋषियों के मत के विरुद्ध निर्णय देते हुए कहा " छागेनाजेन यष्टव्यम" . असुर तो यही चाहते थे. वे इस मत के प्रचारक बन गए; पर ऋषियों ने इस मत को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि यह किसी भी हेतु से संगत नहीं बैठता था. 

संस्कृत-वांग्मय में अनेकार्थ शब्द बहुत है. "शब्दा: कामधेनव:" यह प्रसिद्द है. उनसे अनेक अर्थों का दोहन होता है. पर कौन सा अर्थ कहाँ लेना ठीक है यह विवेकशीलता का काम है. कोई यात्रा पर जा रहा हो और "सैन्धव"  लाने के लिए काहे तो उस समय "नमक" लाने वाला मुर्ख ही कहलायेगा, उस समय तो सिन्धु देशीय घोड़ा लाना ही उचित होगा. इसी तरह भोजन में सैन्धव डालने के लिए कहने पर नमक ही डाला जाएगा घोड़ा नहीं .
इसी तरह आयुर्वेद में कई दवाइयों में घृतकुमारी (ग्वारपाठा) का उपयोग होता है, तो जहां दवा बनाने की विधि में " प्रस्थं कुमारिकामांसम " लिखा गया है; वहाँ किलो भर घृतकुमारी/ग्वारपाठा/घीकुंवार का गूदा ही डाला जाएगा . कुँवारी-कन्या का एक किलो मांस डालने की बात तो कोई नरपिशाच ही सोच सकता है. 
(साभार कल्याण उपनिषद-अंक)
                                                                                            जारी..............

25 टिप्पणियाँ:


सुज्ञ ने कहा…
अमित जी, यही सच है"आसुरी वृत्ति के मनुष्य दंभ,मान और मद में उन्मत्त हुए स्वेच्छाचार पूर्ण आचरण करते हुए पापमय जीवन जीते है." ‘पशूनां समजः, मनुष्याणां समाजः’ पशुओं का समूह ‘समज’ होता है और मनुष्यों का समूह ‘समाज’। अर्थार्त, पशुओं के तो झुंड हुआ करते है, समाज तो मात्र इन्सानो के हुआ करते है।भेद मात्र यही है कि पशुओं के पास भाषा या वाणी नहिं होती। जहां भाषा या वाणी होती है वहीं ‘चिंतन’ होता हैं। आज मनुष्यों ने भाषा व चिंतन होते हुए भी समाज को तार तार कर झुंड(भीड) बना दिया हैं। स्वाद भोग लोलुप स्वेच्छाचारियों द्वारा ही शास्वत धर्म को अशुद्ध करने का कार्य हुआ है।
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
.. सुर, असुर और देव  _____________________ जब कोई दल गठित होता है अथवा एक बड़ा समुदाय एक इकाई में संगठित होता है. वह अपनी एक आचार-संहिता बनाता है. उस आचार-संहिता के अनुसार ही वह अपने दल के सदस्यों से अपेक्षा रखता है कि वे उसका अक्षरशः पालन करें. लेकिन कुछ महत्वाकांक्षी जब उस संगठन में अपना महत्व जबरन स्थापित रखना चाहते हैं अथवा वह स्वयं को संगठन से ऊपर समझाने लगते हैं तब विघटन शुरू होता है.  जैसे आज की राजनीति में  कांग्रेस समय-समय पर विघटित होती रही.  — कांग्रेस (ई), कांग्रेस (एस),  — कांग्रेस अब है (अखिल भारतीय कांग्रेस) + तृणमूल कांग्रेस + राष्ट्रवादी कांग्रेस  ..
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
.. वैदिक युग में  जिस आचार-संहिता को जिन महत्वाकांक्षी व्यक्तियों ने नहीं स्वीकार किया. उसे मनमाना अर्थ दिया और बाद में उनके अनुगामियों ने मनमानी व्याख्याएँ कीं. वे प्रारम्भ में थे तो सुर ही, पर अंतर भेद करने के लिये उन्हें असुर कहा जाने लगा. वे नियम-कायदों को न मानने वाले, उच्छृंखल विचारों के थे, अतः उन्होंने अपने लिये  सुर की बजाय असुर संबोधन को चुना, कारण था : साधारण तब तक ही साधारण है जब तक कि उसमें उपसर्ग के रूप में 'अ' न जुड़ जाये. [अ + साधारण = विशेष हो जाता है.]  सुरों के सुर में उन्होंने तब तक ही सुर मिलाया जब तक कि वे अलग नहीं कर दिए गये. जैसे ही अलग हुए उन्होंने अपने सुरत्व में 'अ' जोड़ लिया. [अ + सुर = असुर हो जाता है.] मर्यादाहीन आचरण, अनैतिक सुख पाने की लालसा, भोगमय प्राथमिकताओं ने उन्हें देश से बहिष्कृत कर ही दिया. तब हुआ 'सुर-असुर संग्राम' या देवासुर (देव-असुर) संग्राम,  सत्ता की लड़ाई के पीछे कारण था मर्यादाओं की रक्षा, नैतिकता का बचाव और आचार-संहिताओं की ऋचाओं में होने वाली छेड़छाड़ को रोकना.  _______________ विस्तार आगे किया जाएगा.  स्रोत : कल्पना  ..
DR. ANWER JAMAL ने कहा…
स्वामी विवेकानंद ने पुराणपंथी ब्राह्मणों को उत्साहपूर्वक बतलाया कि वैदिक युग में मांसाहार प्रचलित था . जब एक दिन उनसे पूछा गया कि भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कौन सा काल था तो उन्होंने कहा कि वैदिक काल स्वर्णयुग था जब "पाँच ब्राह्मण एक गाय चट कर जाते थे ." (देखें स्वामी निखिलानंद रचित 'विवेकानंद ए बायोग्राफ़ी' प॰ स॰ 96) € @ अमित जी, क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ? या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ? 2- ब्राह्मणो वृषभं हत्वा तन्मासं भिन्न भिन्नदेवताभ्यो जुहोति . ब्राह्मण वृषभ (बैल) को मारकर उसके मांस से भिन्न भिन्न देवताओं के लिए आहुति देता है . -ऋग्वेद 9/4/1 पर सायणभाष्य  सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं । Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है । क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
.. जिज्ञासु जमाल जी  कोई महापुरुष तब तक ही महान कहलाता है जब तक वह सद्कार्यों में लगा है. यदि इकबाल हिन्दुस्तान के लिये 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा गाते हैं" उस समय विशेष को हम मान देते हैं. लेकिन जब उसी तर्ज में पाकिस्तान के नगमे गाने लगें तो हम उसे सर माथे नहीं बैठायेंगे. समझे जमाल जी,  स्वयं विवेकानंद जी गौमांस खाकर बीमार पड़े और मरे. इसका मतलब यह नहीं कि उनके समस्त कार्यों से प्रेरणा ली जानी चाहिए. उनके वे कार्य उल्लेखनीय और प्रशंसनीय हैं जो उन्होंने शिकागो सम्मेलन में किया, अपने वक्तृत्व से देश का मान-गौरव बढाया. वाणी की ओजस्विता से सम्पूर्ण चरित्र का अनुमान लगाना आज भी संभव नहीं है. आपने देखें होगे आज के धर्मात्मा ............ आप स्वयं भी काफी जद्दोजहद के बाद शांत होते हैं.  एक बात याद रखें यदि प्रातः स्मरणीय सूर्य भी अपनी किरणों को चुभोने लगे, पाँव जलाने ले तो उससे भी बचा जाता है. कोई महानता का तमगा पूरी उम्र के लिये नहीं पहनता.  आप सोचें :  यदि मैं कोई कल दुराचार करता हूँ मेरे आज के हम-खयाल साथी क्या तब भी साथी ही होंगे?  आपके प्रश्नों का पहले अमित जी जवाब दे लें तब मैं दूँगा. इंतज़ार करियेगा.  ..
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
??? त्रुटि सुधार :  यदि प्रातः स्मरणीय सूर्य भी अपनी किरणों को चुभोने लगे, पाँव जलाने लगे तो उससे भी बचा जाता है. कोई महानता का तमगा पूरी उम्र के लिये नहीं पहनता. ..
अमित शर्मा ने कहा…
चाहे विवेकानंदजी हो या फिर दयानन्दजी या फिर आप और हमारे जैसे संसारी जीव यदि विवेक को साथ रखते हुए वेदार्थ पर विचार किया जाएगा तो वेद भगवान् ही ऐसी सामग्री प्रस्तुत कर देतें है, जिससे सत्य अर्थ का भान हो जाता है. जहाँ द्वयर्थक शब्दों के कारण भ्रम होने की संभावना है, वहाँ बहुतेरे स्थलों पर स्वयं वेदभगवान ने ही अर्थ का स्पस्थिकरण कर दिया है---- "धाना धेनुरभवद वत्सोsस्यास्तिल:" ( अथर्ववेद १८/४/३२ ) --- अर्थात धान ही धेनु है और तिल ही उसका बछडा हुआ है . "ऋषभ" एक प्रकार का कंद है; इसकी जद लहसुन से मिलती जुलती है. सुश्रतु और भावप्रकाश आदि में इसके नाम रूप गुण और पर्यायों का विशेष विवरण दिया गया है . ऋषभ के - वृषभ, वीर, विषाणी, वृष, श्रंगी, ककुध्यानआदि जितने भी नाम आये है, सब बैल का अर्थ रखते है. इसी भ्रम से "वृषभमांस" की वीभत्स कल्पना हुयी हुई है, जो "प्रस्थं कुमारिकामांसम" के अनुसार 'एक सेर कुमारी कन्या के मांस' की कल्पना से मेल खाती है. वैध्याक ग्रंथों में बहुत से पशु पक्षियों के नाम वाले औषध देखे जाते है. ------- वृषभ ( ऋषभकंद ), श्वान ( ग्रंथिपर्ण या कुत्ता घास) , मार्जार ( चित्ता), अश्व ( अश्वगंधा ), अज (आजमोदा), सर्प (सर्पगंधा), मयूरक (अपामार्ग), कुक्कुटी ( शाल्मली ), मेष (जिवाशाक), गौ (गौलोमी ), खर (खर्परनी) . यहाँ यह भी जान लेना चहिये की फलों के गुदे को "मांस", छाल को "चर्म", गुठली को "अस्थि" , मेदा को "मेद" और रेशा को "स्नायु" कहते है -------- सुश्रुत में आम के प्रसंग में आया है---- "अपक्वे चूतफले स्न्नायवस्थिमज्जानः सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते पक्वे त्वाविभुर्ता उपलभ्यन्ते ।।" 'आम के कच्चे फल में सूक्ष्म होने के कारण स्नायु, हड्डी और मज्जा नहीं दिखाई देती; परन्तु पकने पर ये सब प्रकट हो जाती है.'
अमित शर्मा ने कहा…
@जमाल जी --- अल्लाह ने कुर्बानी इब्रा‍हीम अलैय सलाम से उनके बेटे की मांगी थी जो की उनका इम्तिहान था, जिसे अल्लाह ने अपनी रीती से निभाया था. अब उसी लीकटी को पीटते हुए कुर्बानी की कुरीति चलाना कहाँ तक जायज है समझ में नहीं आता. अगर अल्लाह की राह में कुर्बानी ही करनी है तो पहले हजरत इब्राहीम की तरह अपनी संतान की बलि देने का उपक्रम करे फिर अल्लाह पर है की वह बन्दे की कुर्बानी कैसे क़ुबूल करता है.
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
.. अमित जी, आपकी जानकारियाँ पूरी हैं. संतोष हुआ आप पूरे अस्त्र-शास्त्रों के साथ हैं. नहीं तो मैं बिना शास्त्र की समझ के यह वैचारिक लड़ाई लड़ने की सोचने लगा था.  यदि मेरी बात भी कोई अनुचित लगे तो पूरे वेग से आइयेगा. क्योंकि मेरा इन दिनों स्वाध्याय छूटा हुआ है. आपके बहाने कोई-न-कोई पाठ पढ़ ही लूँगा.  ..
आनन्‍द पाण्‍डेय ने कहा…
भई जमाल साहब कदाचित् आपको वृषभ तथा मॉंस का बैल व माँस के अतिरिक्‍त अन्‍य अर्थ भी पता होता तो इस तरह के कुतर्क न करते । वेदों पर तर्क करना हो तो सम्‍यक वेदार्थ पता होने चाहिये ।  स्‍वामी विवेकानन्‍द ने क्‍या कहा ये किसे पता , जिस पुस्‍तक की बात आप कर रहे हैं वह किसी अन्‍य ने स्‍वामी जी के नाम से लिख दी हो ऐसा भी हो सकता है क्‍यूँकि आजतक स्‍वामी विवेकानन्‍द जी के बारे में ऐसा कहीं नहीं पढने को मिला कि उन्‍होने वेदों पर भाष्‍य लिखें हों या व्‍याख्‍यान दिया हो । रही बात हिंसा की तो जब वेद अपने प्रारम्‍भ में स्‍वयं ही हिंसा का विरोध कर रहा है तो इससे बडा प्रमाण मेरे खयाल से और कोई नहीं हो सकता है । रही बात आपको समझाने की तो वो तो कभी नहीं हो सकती क्‍यूँकि समझाया तो उसे जाता है जिसमें आस्‍था हो, आपमें तो दुराग्रह भरा पडा है । वेदों पर कमेन्‍ट करने से पहले अपने धर्मग्रन्‍थ व धर्म के बारे में ठीक से पढ लीजिये और ज्‍यादा मौका न हो तो सलमान रूश्‍दी की सैटनिक वर्सेज पढ लीजिये, अन्‍य पर टांट कसने से पहले अपना जरूर देख लेना चाहिये । अगर सैटनिक वर्सेज आपके पास न हो तो बताइयेगा, हम आपको लिंक दे देंगे ।
सुज्ञ ने कहा…
प्रतुल जी व अमित जी, अनंत साधुवाद!!, न्योछावर हूँ आप दोनो ही प्रज्ञा पर। ###क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ?### विवेचको की आड लेकर दूषित मनोग्रंथियां फैलाने की मंशा इस प्रश्न से झलकती है। सार्थक प्रत्युत्तर दिया, सद्गुण ही स्वीकार्य है, सदैव मात्र व्यक्ति विशेष ही नहिं। अमित जी नें शास्त्रो के शब्द भेद के सत्य युक्तियुक्त निराकरण दिये है। "फलों के गुदे को "मांस", छाल को "चर्म", गुठली को "अस्थि" , मेदा को "मेद" और रेशा को "स्नायु" कहते है"
सुज्ञ ने कहा…
अगर अल्लाह की राह में कुर्बानी ही करनी है तो पहले हजरत इब्राहीम की तरह अपनी संतान की बलि देने का उपक्रम करे फिर अल्लाह पर है की वह बन्दे की कुर्बानी कैसे क़ुबूल करता है. अनवर साहब, वेदों में तो शब्दो के कई अर्थ कई प्रयाय है, पर कुरआन में तो एकार्थ आदेश है न? कुरआन की रोशनी में,हजरत इब्राहीम संग घटी,अल्लाह की राह में संतान की कुर्बानी के आदेश का सीधा अर्थ क्यों नहिं करते। क्यों सांकेतिक बताकर कुरिति पाल रहे हो? अमित जी, अनवर साहव ने यह प्रश्न मेरी पोस्ट पर भी पेस्ट किया है, आपके प्रत्युत्तर ले जाकर मैं भी प्रत्युत्तर में पेस्ट कर देता हूं।
DR. ANWER JAMAL ने कहा…
शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी के ज्ञान को नकार कर अपना घर कैसे बचा पाएँगे आप ? @ अमित जी, कृप्या मूल प्रश्नों के जवाब स्पष्ट रूप से दें कि  1- क्या अपने विवेकानंद जी की जानकारी भी ग़लत है ? या वे भी सैकड़ों यज्ञ करने वाले आर्य राजा वसु की तरह असुरोँ के प्रभाव में आ गए थे ? 2- सायण से ज्यादा वेदों के यज्ञपरक अर्थ की समझ रखने वाला कोई भी नहीं है . आज भी सभी शंकराचार्य उनके भाष्य को मानते हैं ।  क्या सायण और विवेकानंद की गिनती कुक्कुरों , पशुओं और असुरों में करने की धृष्टता क्षम्य है ? 3- Banaras Hindu University में भी यही पढ़ाया जाता है । क्या BHU में भी ग़लत पढ़ाया जा रहा है ?  4- शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी के ज्ञान को नकार कर अपना घर कैसे बचा पाएँगे आप ?
सुज्ञ ने कहा…
अनवर साहब, सारे प्रश्न घुमा-फिरा कर एक ही आश्य के है, विवेक-बुद्धि लगाओ तो उत्तर तो मिल चुके है। खूब जानते है, आपको भ्रम है कि ये महापुरूषों की आलोचना न कर पाएंगे। 4- शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी के ज्ञान को नकार कर अपना घर कैसे बचा पाएँगे आप ?  जिसने शंकराचार्य जी और विवेकानंद जी का घर आबाद ( ज्ञान व कीर्ती)दी, वे वेद सलामत है। शास्वत है। फिर बचाने की बात छोडो घर पहले से ही बुलंद है। बुलंद रहेगा।
मेरा देश मेरा धर्म ने कहा…
बड़े भाई साहब ! जय श्री राधे-राधे  एक छोटी सी व्यंग कथा - एक मित्र (धोबी) अपने दूसरे मित्र (किसान) को तम्बाकू खाने की लत छोड़ने के लिए कहता है, और एक उदहारण देता है - कहता है यार! कल मैंने अपने गधे के आगे तम्बाकू खाने के लिए दिया, उसने भी नहीं खाया, इसका मतलब गधे भी तम्बाकू नहीं खाते !! किसान मित्र तुरंत बोला, यार सही कहा - गधे ही तम्बाकू नहीं खाते !!!!! अब इन शव भक्षकों की दृष्टी भी किसान जैसी ही तो है, इन्हें हर परिस्थिति में ये अनुचित कार्य तो करना ही है !!!  ==================================================================================================================================================>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>><<<<<<<<<>>>>>>>>>>>>>> तो शव भक्षकों लगे रहो -  मांसाहारी और शाकाहारी के संयुक्त रूप को सामाजिक रूप से हम कुत्ता (डॉग) कहतें है - शव भक्षकों "! पहुंचे तो होंगे ही यहाँ तक ! अपनी जाति का शुभ नाम भी बताते जाएँ @@@@@@@@@@@@@
अमित शर्मा ने कहा…
जमाल साहेभ क्या रट्टा लगाए हुए हैं आप किसी भी मनुष्य का ज्ञान हमेशा पूर्ण नहीं होता, और ना हिन्दू किसी एक का आँख मीच कर अनुगमन करने वाली भेड़ है. (आप जैसे मेरे कुटुम्बियों के समान) विवेकानंदजी क्या कहा, क्या पाया इसका उन्होंने दुराग्रह नहीं किया की मैंने जो जाना समझा है वही परीपूर्ण अंतिम सत्य है ..................और जो इसे नहीं मानेगा वह मार डाला जाएगा. तो जब उन्होंने इस बात का उद्घोष ही नहीं किया की मेरा ज्ञान ही परीपूर्ण,अंतिम और सत्य है ............मैं जो कह रहा हूँ उसके इनकारी के लिए सिर्फ और सिर्फ मौत है ...................जब उनका ऐसा आग्रह नहीं था तो आप क्यों विवेकानंदजी की अवमानना को लेकर दुःख दुबले हो रहे है. ऐसा ही सायण भाष्य और BHU के लिए समझे . बंधुजी मेरा घर मेरे पुरखों के प्रताप से सुरक्षित है....................आप अपने पाप के ताप से अपने घर को बचाने का उपाय सोचिये .
man ने कहा…
बहुत बढ़िया अमीत भाई असुरो की एक ही जात होती हे "'''असुर"  जरूर पधारे http://jaishariram-man.blogspot.com/2010/11/blog-post_16.html
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
.. हमारी गली से कुछ दूर  हर साल की तरह  इस बार भी  चीख-पुकार होगी  जीव-तंतुओं द्वारा - "ईद मुबारक ईद मुबारक" की.  इस चीख का अर्थ होगा "जाएँ तो जाएँ कहाँ"  यह अर्थ की चौथी शब्द शक्ति है — तात्पर्य शब्दशक्ति  इस शक्ति के द्वारा हम वास्तविक अर्थ तक पहुँचते हैं.  मुबारकबाद में भी 'बचाओ बचाओ का स्वर' सुनते हैं.  ..
सुज्ञ ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
सुज्ञ ने कहा…
चीख भी सुन लो सुनो पुकार भी, श्राप भी सुनो और हाहाकार भी। ए आदम की औलाद तू क्या आदमी, औलादों की तेरे भी थी क्या कमी। जिन की जान के बदले आई हमारी जान पर, जिएगी तेरी औलादे भी बनकर जानवर॥
DR. ANWER JAMAL ने कहा…
@प्रिय मोहक मुस्कान स्वामी अमित जी ! @ मेरे महान पूर्वजोँ की ज्ञान संपदा के अडिग प्रहरी प्रतुल वशिष्ठ जी ! आपका स्वागत है । @ सुज्ञ जी ! स्वामी करपात्री वेदार्थ पारिजात भाग 2 पृष्ठ 1977 पर लिखते हैं - यज्ञ में किया जाने वाला पशुवध भी पशुओं का स्वर्गप्रापक होने से तथा पशुयोनि निवारण पूर्वक दिव्यशरीर प्राप्ति कराने में कारण होने से पशु का उपकारक ही होता है । वह यज्ञीय पशु अपकृष्ट योनि से विमुक्त होकर देवयोनि में उत्पन्न होता है ।
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
.. हे करुणा दिल जमाल जी!  स्वामी करपात्री की परम्परा को आप आगे लिये जा रहे हैं? आप भी कुछ ऎसी पुस्तकें रच जाइए जिससे आने वाली पीढी इस बढ़ते पशु वध को रोक ना पाए.  आपके ये सराहनीय कार्य आपको जन्नत बक्शीश करेंगे.  आप अपनी समझ से चलिए न!  सोच कर देखिये कि  वह क्या पूजा या त्यौहार जो सभी का हित ना सोचे.  त्यौहार हों तो सभी जीव-जंतुओं के लिये होने चाहिए.  यदि बलि आदि क्रियायें स्वर्ग दिलाती हैं तो आप अपने परिवार को आगे कीजिये ना पहले.  बेजुबान पशुओं को आगे करके आप उनका मार्ग क्यों प्रशस्त कर रहे हैं.  जो जीव स्वयं पर हमला कर दे, आत्म रक्षा के लिये उसका वध कर देना तक तो ठीक है. लेकिन आप क्यों अपनी ईद  पैशाचिक कर्म बलि करने वाले हिन्दुओं के समर्थन से उचित/ न्यायसंगत ठहराना चाहते हैं.  ..
प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…
.. हे गूढ़ अर्थों को समझने वाले जमाल! क्या पशुओं का स्वर समझने की आपने कोशिश की है.  क्या वे अपनी इच्छा रखते हैं जन्नत जाने में?  यदि नहीं, तो आप उनके पीछे क्यों पड़े हैं गंडासा लिये.  नहीं मैं भेज कर रहूँगा आज अपने प्यारे बकरे को  चाहे कुछ हो जाये.  इस ऊँचे ऊँट को आज़ में जन्नत की दहलीज तक खींच कर ले चलूँगा. बड़ा बनता है.  ईद है कोई मामूली पर्वत नहीं. इसके तले लाकर ही रहूँगा.  ..
HAKEEM YUNUS KHAN ने कहा…
Nice post .  'शाकाहार में मांसाहार'  @ सभी साहब, आप मेरे ब्लाग hiremoti.blogspot.com पर तशरीफ़ लाकर 'शाकाहार में मांसाहार' भी देख लें ।

Monday, June 27, 2011

पुनर्जन्म और आवागमन में अंतर

पुनर्जन्म और 84 लाख योनियों में आवागमन , ये दो अलग अलग सिद्धांत हैं ।
पुनर्जन्म परलोक में होता है जबकि आवागमन यहीं चक्कर काटने का नाम है ।

हम पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं लेकिन आवागमन को दार्शनिकों की कल्पना मानते हैं ।

गीता भी एक दर्शन है ।

आवागमन की मान्यता वेदों में नहीं पाई जाती जो कि धर्म का मूल स्रोत है ।

...लेकिन किसी के मानने पर कोई पाबंदी तो है नहीं । आज के वैज्ञानिक दौर में भी सफ़ेद झूठ बोला जा रहा है कि मृत्यु के घंटो बाद भी दिमाग़ जीवित रहता है ।

ECG और तरंग आदि शब्द बोले नहीं कि भाई लोगों ने उनके लेख को महान वैज्ञानिक खोज ही घोषित कर दिया ?

वाह , ज्ञान हो तो ऐसा जिसे पढ़कर डाक्टर भी हैरान हो जाय।
कहा जाता है कि इस उपदेश को सुनकर अर्जुन ने श्री कृष्ण जी की पूरी सेना समेत करोड़ो हिंदुओं को मार डाला था। इस युद्ध में 1 अरब 88 करोड़ हिंदुओं ने एक दूसरे की हत्या कर दी और ऐसे ऐसे युद्ध यहाँ आए दिन हुआ करते थे ।

इसके बावजूद भी लोग कहते हैं कि हम तो 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' मानते हैं।
भावना अच्छी है लेकिन यह भी देखना चाहिए कि क्या गीता का उपदेश सुनकर सुखी हो गए थे ?

श्री कृष्ण जी सदाचारी और नीति कुशल थे । इसलिए न तो उन्होंने अपनी सेना दुर्योधन को दी होगी और न ही अपने शिष्य के हाथों उन्हें मरवाया होगा।
वैसे भी गीता की भाषा श्री कृष्ण जी के काल जितनी पुरानी नहीं है।
यादवों से चिढ़ने वाले जातिजीवियों ने श्री कृष्ण जी के उत्तम चरित्र पर लाँछन लगाने के लिए ही उन्हें अर्जुन का रथ हाँकने वाला बताया और अपने शिष्यों को युद्ध के नियम भंग करने की प्रेरणा देते भी दिखाया ।
श्री कृष्ण जी जैसे सदाचारी और परमवीर के लिए ये सब बातें संभव नहीं हैं।
गीता उनके बहुत बाद किसी दार्शनिक ने लिखी है।
शोध करने वाले ऐसा मानते हैं ।
सच को सामने आना ही चाहिए ताकि सदाचारी महापुरूषों का चरित्र हरेक झूठे आरोप से बचा रहे ।

Tuesday, April 20, 2010

वेदों की मूल दुनिया

हर नयी यात्रा में मेरा प्रयत्न होता है कि कुछ नया पढ़ा जाये जिसे पढ़ने का घर पर आम व्यस्तता में समय नहीं मिलता. इस बार बँगलौर गया तो पढ़ने के लिए श्री राजेश कोच्चड़ की लिखी पुस्तक "वेदिक पीपल", यानि "वेदों के समय के लोग" पढ़ी. चूँकि आईसलैंड के ज्वालामुखी की वजह से अभी बँगलौर में रुका हुआ हूँ तो इस पुस्तक के बारे में लिखने का समय भी मिल गया. दरअस्ल, यह पुस्तक सभी वेदों को लिखने वाले लोगों की बात नहीं करती, इसका मुख्य ध्येय सबसे पहले वेद, ऋगवेद को लिखने वाले लोगों के बारे में है. साथ ही, यह पुस्तक रामायण तथा महाभारत की कुछ मुख्य घटनाओं की इतिहासिक जाँच करती है. (The vedic people - Their history and geography, by Rajesh Kocchar, Orient Blackswan 2009 - first ediation, 2000 by Orient Longman).

राजेश जी सामान्य व्यक्ति नहीं, नक्षत्रशा्स्त्र से जुड़ी भौतिकी के विषेशज्ञ हैं, बँगलौर में स्थित भारतीय नक्षत्रीय भौतिकी राष्ट्रीय संस्थान के डायरेक्टर रह चुके हैं तथा तथा आजकल दिल्ली में भारतीय विज्ञान, तकनीकी तथा विकास राष्ट्रीय संस्थान के डायरेक्टर हैं.

वेदों को लिखने वाले कौन लोग थे, वह कहाँ से आये थे, उनका क्या इतिहास था, इस सबके बारे में लिखने के लिए राजेश जी भाषा विज्ञान, साहित्य, प्राकृतिक इतिहास, पुरात्तवशास्त्र, नक्षत्रशास्त्र आदि विभिन्न दृष्टिकोणों से इस विषय की छानबीन करते हैं. उनके शौध के निष्कर्श चौंका देते हैं लेकिन उनके तर्क को नकारना कठिन है. जिस वैज्ञानिक तरीके से विभिन्न दृष्टिकोणों से उपलब्ध जानकारी को वह प्रस्तुत करते हैं, उससे यह लगता है कि किसी अन्य निष्कर्श पर पहुँचना संभव भी नहीं. इस पुस्तक को पढ़ कर, भारत की प्रचीन संस्कृति और धर्म के बारे में जो धारणाएँ थी, उनको नये सिरे से सोचने का अँकुश सा चुभता है.

पुस्तक का प्रमुख निष्कर्श है कि इंडोयूरोपी मूल के लोग एशिया के मध्य भाग में बसे थे, जहाँ इन्होंने घोड़े को पालतु बनाया, पहिये, रथों तथा घोड़ेगाड़ियों का आविष्कार किया. इन्हीं का एक गुट, पश्चिम की ओर निकला जिससे यूरोप के विभिन्न लोग बने. इन लोगों का फिनलैंड और हँगरी के मूल लोगों से सम्पर्क था जिससे दोनों की भाषाओं में आपसी प्रभाव पड़ा, जिसकी वजह से फिनिश तथा हँगेरियन इंडोयूरोपी भाषाएँ न होते हुए भी, इन भाषाओं के कुछ शब्द मिलते हैं. इन लोगों के दल विभिन्न समय पर जहाँ आज अफगानिस्तान है उस तरफ़ से हो कर ईरान भी गये और भारत की ओर भी बढ़े, जहाँ वह लोग हड़प्पा के जनगुटों से मिलजुल गये. इसी वजह से प्राचीन ईरानी धर्म जोरस्थत्रा के धर्मग्रंथ अवेस्ता में कुछ वही देवता मिलते हैं जो कि ऋगवेद में मिलते हैं जैसे कि इंद्र, मित्र, वरुण आदि. अग्नि पूजा का मूल भी दोनों लोगों को मिला.

राजेश जी के अनुसार ईसा से 1400 वर्ष पहले वहीं दक्षिण अफगानिस्तान में इसी भारतीय ईरानी मूल के कुछ लोगों ने ऋगवेद के श्लोक लिखना प्रारम्भ किया. यह श्लोक लिखने का कार्य करीब पाँच सौ वर्ष तक चला इसलिए ऋगवेद का मूल प्राचीन भाग ईसा से 900 वर्ष पहले के आसपास पूर्ण हुआ, तब तक यह लोग भारत के पश्चिमी भाग में पहुँच चुके थे. उनका कहना है कि जिस सरस्वती नदी जिसे "नदियों की माँ" कहा गया, वह दक्षिण अफगानिस्तान में बहने वाली नदी थी. उनके अनुसार रामायण की घटनाओं का समय भी ईसा से 1480 वर्ष पूर्व का है, वह सब दक्षिण अफगानिस्तान में ही घटित हुआ. महाभारत का युद्ध जो ईसा से करीब 900 वर्ष पहले हुआ, उसकी कर्मभूमि भी पश्चिम का वह हिस्सा है जहाँ आज पाकिस्तान है.

उनका कहना है पूर्व को बढ़ते यह मानव गुट, हड़प्पा के लोगों से मिल कर यायावर जीवन छोड़ कर कृषि में लगे. यह लोग अपने साथ साथ नदियों तथा जगहों के पुराने नाम भी ले कर आये और नये देश में कुछ जगहों तथा नदियों को यह पुराने नाम दिये, कुछ वैसे ही जैसे इटली, फ्राँस, ईग्लैंड से अमरीका जाने वाले प्रवासी अपने साथ अपने शहरों के नाम ले गये और नये अमरीकी शहरों को न्यू योर्क, न्यू ओरलियोन, रोम, वेनिस जैसे नाम दिये. यानि कुरुक्षेत्र, अयोध्या आदि मूल जगह दक्षिण अफगानिस्तान में थीं जिनके नामों को भारत में लाया गया. इसी वजह से ऋगवेद में गँगा नदी का नाम नहीं मिलता.

इन सब बातों के बारे में वह साहित्य, भाषाविज्ञान, पुरात्तव, गणिकी, नक्षत्रज्ञान आदि विभिन्न सूत्रों से जानकारी देते हैं, और उनके तर्कों के सामने अचरज सा होता है और लगता है कि हाँ यह हो सकता है.

किताब को पढ़ने के बाद सोच रहा था कि अगर अफगानिस्तान में पुरात्तव की खुदाई हो सके और राजेश जी कि विचारों को पक्का करने के लिए अन्य सबूत मिलने लगें तो इसका क्या असर पड़ेगा? शायद इस तरह की बातें भारत विभाजन के समय अगर मालूम होतीं तो क्या असर पड़ता?

मन में यह बात भी उठी कि पश्चिम से आने वाले यह लोग, अपने पहले आ कर बस जाने वाले लोगों से किस तरह मिले, किस तरह उनके धर्मों का समन्वय हुआ? जैसे कि हिंदू धर्म के तीन सबसे अधिक पूजे जाने वाले भगवान, राम, कृष्ण तथा शिव, तीनों ही श्याम वर्ण के कैसे हुए जबकि ऋगवेद को लिखने वाले तो गोरे रंग के थे? कैसे भारत के एक हिस्से में महोबा का पूजा होती है, दूसरे हिस्से में उसे महिषासुर कह कर मारा जाता है? कैसे पुरुष देवताओं की पूजा करने वाले आर्य भारत में बस कर शक्ति, लक्षमी और ज्ञान की देवियों को मानने लगे?

इन प्रश्नों के उत्तर कहाँ से मिलेंगे, अगर आप किसी बढ़िया किताब के बारे में जानते हों तो मुझे अवश्य बताईयेगा. आप को मिले तो राजेश कोच्चड़ की इस किताब को अवश्य पढ़ियेगा. और अगर आप इस किताब को पढ़ चुके हैं तो यह भी बतलाईयेगा कि उनके तर्क आप को कैसे लगे?
साभार Sunil Deepak पर ३:०२ AM
http://jonakehsake.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form

Monday, April 12, 2010

आप दहेज की मांग छोड़ दीजिए और फिर देखिए कि मुसलमानों के साथ हिन्दू लड़कियों के विवाह में कितनी कमी आती है ? Dowry .

हम जिस कायनात में रहते बसते हैं इसकी एक एक चीज़ नियम में बंधी है । कायनात की हर चीज़ परिवर्तनशील है लेकिन इसी कायनात की एक चीज़ ऐसी है जो कभी नहीं बदलती और वह है नियम , जिसका पालन हर चीज़ कर रही है । अपरिवर्तनीय नियमों की मौजूदगी बताती है कि नियम बनाने और उन्हें क़ायम रखने वाली कोई अपरिवर्तनशील हस्ती ज़रूर मौजूद है । इसी हस्ती को लोग हरेक भाषा में ईश्वर , अल्लाह , गॉड , यहोवा और खु़दा वग़ैरह नामों से जानते हैं । प्रकृति और जीवों में जैसे जैसे चेतना और बुद्धि का विकास होता गया वैसे वैसे उसमें ज्ञान और सामथ्र्य का स्तर भी बढ़ता गया और मनुष्य में यह सबसे अधिक पाये जाने से वह स्वाभाविक रूप से सबसे ज़्यादा ज्ञान का पात्र ठहरा और जहां ज्ञान होता है वहां शक्ति का उदय खुद ब खुद होता है । प्रकृति की हरेक चीज़ तो नियम का पालन करने में मजबूर है लेकिन इनसान ज्ञान के कारण शक्ति के उस मक़ाम को पा चुका है कि चाहे तो वह नियम को माने और चाहे तो नियम की अवहेलना कर दे । नियम के पालन या भंग करने में तो वह आज़ाद है लेकिन नियम के विरूद्ध चलकर उसका नष्ट होना निश्चित है , यह भी कायनात का एक अटल नियम है और यह एक ऐसा नियम है कि यह इनसान पर ज़रूर लागू होता है । कोई भी इनसान न तो इसे भंग कर सकता है और न ही इसे बदल सकता है । इनसान केवल एक सामाजिक प्राणी ही नहीं बल्कि एक नैतिक प्राणी भी है । एक इनसान को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से जीवन गुज़ारने के लिए बहुत से साधनों की ज़रूरत पड़ती है । इन साधनों को वह प्राप्त भी करता है और दूसरों को देता भी है ।
औरत की जिस्मानी बनावट मर्द के मुक़ाबले अलग है । बच्चे की पैदाइश और उसका पालन पोषण उसे एक मर्द से डिफ़रेन्ट बनाता है । शारीरिक रूप से वह मर्द के मुक़ाबले कमज़ोर भी पायी जाती है । खुद सारे मर्द भी जिस्मानी ताक़त में बराबर नहीं होते । लोगों का ज्ञान भी उनकी ताक़त में फ़र्क़ पैदा कर देता है । लोगों के हालात भी उनकी ताक़त को मुतास्सिर करते हैं ।
वह कौन सा विधान हो , जिसका पालन करते हुए अलग अलग ताक़त वाले सभी औरतों और मर्दों की सभी जायज़ ज़रूरतें उनके सही वक्त पर इस तरह पूरी हो जायें कि न तो उनकी नैतिकता प्रभावित हो और न ही उनमें आपसी नफ़रत से संघर्ष के हालात पैदा हों ?
इसी विधान का नाम धर्म है । सृष्टि के दीगर नियमों की तरह यह विधान भी स्वयं विधाता की तरफ़ से निर्धारित है । आदमी को आज़ादी है कि वह चाहे तो इस विधान को माने और चाहे तो न माने लेकिन न मानने की हालत में इनसानी सोसायटी का अन्याय और असंतुलन का शिकार होना लाज़िमी है । जहां अन्याय होगा तो फिर वहां नफ़रत और प्रतिकार भी जन्मेगा , जिसका फ़ैसला ताक़त से किया जाएगा या फिर छल और कूटनीति से । इनमें से हरेक चीज़ समस्या को बढ़ाएगी , शांति और नैतिकता को घटाएगी । इनसान अपने लिए विधान बनाने में न तो कल समर्थ था और न ही आज समर्थ है । विधाता के विधि विधान का पालन करने में ही उसका कल्याण है । पवित्र कुरआन यही बताता है । पवित्र कु़रआन ही मानवता के लिए ईश्वरीय विधान है , ईश्वर की वाणी है । यह एकमात्र सुरक्षित ईशवाणी है , ऐतिहासिक रूप से यह प्रमाणित है । यह अपनी सच्चाई का सुबूत खुद है । कोई मनुष्य इस जैसी वाणी बनाने में समर्थ नहीं है । यह अपने आपमें एक ऐसा चमत्कार है जिसे कोई भी जब चाहे देख सकता है । जैसे ईश्वर अद्वितीय है वैसे ही उसकी वाणी भी अद्वितीय है । यहां हमारे स्वदिल अज़ीज़ भाई प्रिय प्रवीण जी का एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि
प्रिय प्रवीण जी ! आप एक ज्ञानी आदमी हैं । इस तरह के छोटे मोटे सवाल तो आप खुद भी हल कर सकते हैं और आपकी पहंुच तो उस लिट्रेचर तक है जो बहुतों को देखने के लिए भी नसीब नहीं होता । शायद इस तरह के सवाल पूछकर आप या तो ब्लॉगर्स के ज्ञान का स्तर जांचना चाहते होंगे या फिर उनका स्तर कुछ ऊँचा उठाना चाहते होंगे ।आपने ब्लॉगवाणी से तो कभी नहीं पूछा कि जब उसके शरीर और जिव्हा नहीं है तो उसे वाणी कहां से प्राप्त हो गयी ?
मनुष्य के आधार पर ईश्वर की कल्पना करने से ही इस तरह के सवाल जन्म लेंगे और जब इन्हें हल करने की तरफ़ बढ़ा जायेगा तो फिर एक के बाद एक बहुत से दर्शन जन्म लेंगे और ईश्वर के वुजूद संबंधी प्रश्नों का अंत तब भी न होगा और तब दर्शनों के चक्कर में पड़कर न्यायपूर्ण रीति से लोगों के हक़ अदा करने की शिक्षाएं भुला दी जाएंगी ।
पूर्व में , इसलाम को जब वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था , तब यही कुछ हुआ । ईश्वर के अस्तित्व के बारे में प्रश्न उठा कि वह कैसा है ?
क्या वह ऐसा है ? या फिर वह ऐसा है ?
उत्तर में नेति नेति इतना कहा गया कि निर्गुण ब्रह्म की कल्पना ने जन्म ले लिया । एक ऐसा अचिन्त्य और अविज्ञेय ईश्वर जिस तक इनसान की कल्पना भी पहुंचने में बेबस है ।
यह एक ठीक बात है लेकिन इनसान तो कुछ समस्याएं भी रखता है और उनमें वह ईश्वर की मदद भी चाहता है तो फिर सगुण ईश्वर की कल्पना को जन्म लेना ही था । तब न केवल इनसानों को बल्कि मछली , कछुआ और सुअर तक को ईश्वर का अवतार मान लिया गया । ईश्वर के गुणों को निश्चित करने के चक्कर में ही निर्गुण भक्ति धारा और सगुण भक्ति धारा का जन्म हुआ । प्रयोगशाला का विषय इनसानी जिस्म है । इसकी हरेक नस नाड़ी को चीर फाड़कर देखा जा सकता है और देखा जा भी चुका है लेकिन क्या इनसानी जिस्म की सारी गुत्थियां हल कर ली गयी हैं ?
नहीं ।
ईश्वर प्रयोगशाला का विषय नहीं है । वह आपकी बुद्धि का विषय है । आप बुद्धि से काम लेंगे तो आप जान जायंगे कि हां , ईश्वर वास्तव में है । आप प्रकृति की कोई भी चीज़ देखेंगे तो आप उसमें एक डिज़ायन और व्यवस्था पाएंगे और डिज़ायन और व्यवस्था तभी मुमकिन होती है जबकि बुद्धि , ज्ञान और शक्ति से युक्त एक हस्ती मौजूद हो । इनसान किस कमज़ोर हालत में पैदा होता है लेकिन यह इनसान भी आज इस बात में सक्षम है कि रेडियो और टेलीफ़ोन जैसी निर्जीव चीज़ों को ‘वाणी‘ दे दे । इनसान ऐसे घर बना चुका है जिन्हें स्मार्ट हाउस कहा जाता है । यह घर अपने मालिक की ज़रूरतों को बिना उसके बयान किए समझ लेता है और संकेत मात्र से पूरा भी कर देता है । इनसान तो निर्जीव भी नहीं है । उसके अन्तःकरण में सर्वथा समर्थ परमेश्वर की ओर से वाणी का अवतरण तो किंचित भी ताज्जुब की बात न होना चाहिये । ख़ास तौर से तब जबकि इनसान खुद बिना किसी ज़ाहिरी सबब के दूसरे आदमी के मन में अपना पैग़ाम पहुंचाने में सक्षम है । इस विद्या को टेलीपैथी के नाम से जाना जाता है ।
मुस्लिम सूफ़ियों , हिन्दू योगियों और बौद्ध साधकों के लिए यह एक मामूली सी बात है और आज पश्चिमी देशों में यह विद्या भी दीगर विद्याओं की तरह सिखाई जाती है । जब खुद इनसान ही बिना जिव्हा के अपना पैग़ाम दूसरे इनसानों तक पहुंचा सकता है तो फिर उस सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बारे में ही इसे क्यों असंभव मान लिया जाए ?
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एक प्रबुद्ध व्यक्ति के प्रश्न के जवाब के बाद एक वेबकृमि की इस चिन्ता पर क्या टिप्पणी की जाए कि लड़के लड़कियां अन्तरधार्मिक विवाह क्यों कर रहे हैं ?
नरगिस समेत बहुत सी फ़िल्मी हीरोइनों ने हिन्दू भाइयों से विवाह किया । क्या उन कलाकार मर्दों को किसी गुरूकुल या आश्रम से ऐसा करने का आदेश या मिशन दिया गया था ?
काम तो ऐसा प्रबल होता है कि जब इसका आवेग उठता है तो एक ऐसा व्यक्ति भी केवट की कन्या से नाव में , बीच पानी में ही बलात्कार कर बैठता है जिसे दुनिया ऋषि समझती थी । विश्वामित्र भी मेनका के वार से न बच पाए । मुरली की तान सुनकर तो सभी गोपियां अपने पति और बच्चों तक को बिसराकर अपने आशिक़ के पास भागा करती थीं । ऐसा पुराण बताते हैं लेकिन मैं इसे सत्य नहीं मानता , लेकिन जो लोग इसे सत्य मानते हैं उनके लिए यह प्रमाण बनेगा । शकुंतला ने दुष्यंत को अपना सर्वस्व सौंपने से पहले कब पिता की अनुमति ली थी ?ज़्यादा लिखना मैं मुनासिब नहीं समझता क्योंकि इन प्रसिद्ध कथाओं को सभी जानते हैं ।प्रेम विवाह या गंधर्व विवाह प्राचीन भारतीय परम्परा है । कितनी ही मुस्लिम लड़कियां आज हिन्दुओं के घरों में बैठी गाय के गोबर से चैका लीप रही हैं । ठीक ऐसे ही कुछ हिन्दू लड़कियों ने मुसलमानों के साथ वक्त गुज़ारा । उन्हें बरता , परखा और फिर अपने क़ानूनी हक़ का इस्तेमाल करते हुए उनसे जीवन भर का नाता जोड़ लिया ।
जब औरत मर्द आपस में घुलमिलकर अंतरंग सम्बन्ध बनाएंगे तो यह स्थिति तो आएगी ही , मुस्लिम के साथ भी और ग़ैर मुस्लिम के साथ भी । इसमें हाय तौबा मचाने और इसलाम को बदनाम करने की क्या ज़रूरत है ?
इसलाम की तालीम तो मर्द के लिए यह है कि वह न तो औरत को तकने या घूरने का गुनाह करे और न ही वह औरत को छुए , चाहे औरत मुस्लिम हो या ग़ैर मुस्लिम ।
और अफ़सोस है ऐसी बहनों पर जो अक्ल के दुश्मनों की हां में हां मिलाकर उनकी भलसुगड़ाई बटोरना चाहती हैं ताकि उन्हें सामान्य मुसलमान न समझा जाए बल्कि उन्हें विशिष्ट चिंतक समझा जाए और उनकी तरक्क़ी होती रहे । आज माता की कथाएं सहेलियों को पढ़कर सुनाई जा रही हैं तो कल सास को भी सुनाई जाएंगी । कोई कुछ पढ़े और किसी को सुनाए या किसी हिन्दू के साथ ही घर बसाए , हमें कोई ऐतराज़ नहीं है । हमें तो ऐतराज़ इस बात पर है कि बहन जी अलगाववादी नामहीन लौंडे के ब्लॉग पर कह रही हैं कि इसलाम में किसी हिन्दू लड़की को मुसलमान करने पर 72 हूरों का लालच दिया गया है । हमें पवित्र कुरआन की हज़ारों आयतों और लाखों हदीसों में इस अर्थ की कोई एक भी आयत या सही हदीस दिखाईये वर्ना तौबा कीजिए । किसी भी बड़े मदरसे के आलिम का जायज़ा ले लीजिये , उसकी पत्नी पुश्तैनी मुसलिम घराने से ही मिलेगी । मौलवी साहिबान के घरों में तो कोई हिन्दू लड़की नहीं मिलेगी , हां उनकी तालीम से हटकर चलने वाले कलाकारों , नेताओं और पत्रकारों के घरों में ज़रूर हिन्दू लड़कियां ज़रूर मिल जाएंगी । हिन्दू लड़कियां मुसलमान लड़कों से ब्याह क्यों कर रही हैं ?
क्योंकि हिन्दू लड़कों के बाप तो अपने बेटों की ऊँची क़ीमत वसूलते हैं और हरेक लड़की के बाप में इतनी क़ीमत देने की ताक़त होती नहीं । अब लड़की करे तो क्या करे ?
आप दहेज की मांग छोड़ दीजिए और फिर देखिए कि मुसलमानों के साथ हिन्दू लड़कियों के विवाह में कितनी कमी आती है ?
मुसलमान से ब्याह करने के पीछे ख़तना भी एक बड़ा कारण है क्योंकि ख़तना के बाद लिंगाग्र कपड़े की रगड़ खाता है जिससे उसमें घर्षण के समय स्तम्भन का स्वभाव विकसित हो जाता है और वह अपनी प्रिया को पूर्ण संतुष्ट करने में सक्षम होता है ।
मुसलमान भोजन में प्रायः वे चीज़ें खाता है जो भारद्वाज ऋषि ने भरत जी की सेना को उस समय परोसी थीं जब वे मेरे प्रिय श्री रामचन्द्र जी को वापस लाने के लिए निकले थे और उनका पता पूछने के लिए उनके आश्रम में एक रात के लिए ठहरे थे । आयुर्वेद भी उन्हें पुष्टिकारक मानता है । इससे भी मुसलमान ज़्यादा पुष्ट होकर अपनी प्रिया को ज़्यादा संतुष्ट करता है ।
लव जिहाद का भी चर्चा ख़ामख्वाह किया जाता है ।
ऐसा कोई जिहाद हिन्दुस्तान में नहीं चल रहा है । लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि जिहाद कोई भी हो , उसे लड़ने के लिए मज़बूत हथियार और अच्छी ट्रेनिंग की ज़रूरत पड़ती है । हरेक हिन्दू को देखना चाहिये कि लव जिहाद में काम आने वाला हथियार कौन सा है ? और उसका हथियार कितना सक्षम है ?
उसने ट्रेनिंग किस गुरू से ली है ?
सन्यासियों से गृहस्थ धर्म की ट्रेनिंग लोगे तो फिर कुवांरी लड़कियां मुसलमानों की पनाह में आएंगी और शादीशुदा औरतें किसी इच्छाधारी का दामन थामेंगी । कारगिल हो या ताज़ा नक्सली हमला , हरेक चोट के बाद यही हक़ीक़त सामने आयी कि सैनिकों के हथियार भी वीक थे और उनकी ट्रेनिंग भी नाकाफ़ी थी । यही बात तथाकथित लव जिहाद के प्रकरण में है ।तुम्हारी लड़कियां अगर दूसरों के पास जा रही हैं तो यह तुम्हारी कमी और कमज़ोरी के कारण है । अपनी ‘वीकनेस‘ को दूर कीजिए , मुसलमानों को दोष क्यों देते हो ?